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सुर्यबाला की जीवन-दृष्टि सतह पर बहते जीवन-प्रवाह की गहराई में प्रवेश करती है। मनुष्यता के क्षरण से जूझते स्त्री-पुरुष उन्हें वहीं मिलते हैं। लेखिका का रचनात्मक विकास निरंतर विसंगतियों से भरे समाज के वास्तविक हिस्सों को पहचानकर उनके संघर्ष को उद्घाटित करने की दिशा में हुआ है। उनकी ‘होगी जय, होगी जय हे पुरुषोत्तम नवीन.’ जैसी कहानियाँ मनुष्य को बौने और मोहताज बना देनेवाले दुर्दांत समय की पहचान करती हैं, तो ‘माय नेम इश ताता’ की नन्ही ताता के केंद्र से सूर्यबाला स्वार्थ, अवसरवाद, प्रदर्शनप्रियता और शहरातीपन से उपजे विघटन एवं संवेदनहीनता की टोह लेती हैं। लेखिका ने ऐसे आशयों को गहरे व्यंग्य में सँभाला है। यह व्यंग्य, उनकी मूल्य चेतना का निर्वाह भी करता है। सूर्यबाला जीवन के सुदृढ़ मानवीय आधारों पर गहरा विश्वास करती हैं। जटिलताओं से भरे युगबोध की उन्हें बराबर पहचान है, किंतु इसके मुकाबले खड़े जीवन-मूल्यों का भरोसा भी उन्हें मिलता है। अपनी कहानियों में वे बड़ी सावधानी से मार्मिकता को पूरे असर में उभारने वाली भाषा निर्मित करती हैं। मर्म-स्पर्शिता लेखिका के लिए एक अनिवार्य रचना-मूल्य है। —डॉ. चंद्रकला त्रिपाठी (वरिष्ठ समीक्षिका एवं कवयित्री).
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