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Pahali Chingari

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"पहली चिनगारी" एक ऐतिहासिक उपन्यास है, जो भारत के स्वाधीनता संग्राम की उस अनदेखी, अनकही लेकिन बेहद महत्वपूर्ण क्रांति पर आधारित है, जिसने महात्मा गांधी के 'भारत छोड़ो आंदोलन' से भी दशकों पहले स्वतंत्रता की नींव रखी थी।

राजमहल की पहाड़ियों और संथाल परगना की धरती से निकली यह लपट सिदो, कान्हू, चाँद और भैरों की ज्वाला थी, जिन्होंने 1855 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आदिवासी जनक्रांति का बिगुल फूँका। "करो या मरो" का नारा उन्हीं के स्वर से सबसे पहले गूंजा था।

इस पुस्तक में:

  • सिदो और कान्हू जैसे वीरों की जीवंत गाथा है,

  • दस हजार से अधिक संथालों की बलिदान गाथा है,

  • और जन-चेतना की वह चिंगारी है, जो आज भी प्रेरणा देती है।

‘पहली चिनगारी’ न केवल इतिहास के एक भूले अध्याय को सामने लाती है, बल्कि यह बताती है कि कैसे सीमित साधनों में भी असाधारण हिम्मत और एकता से बदलाव लाया जा सकता है। यह उपन्यास इतिहास के छात्रों, सामाजिक आंदोलनों में रुचि रखने वाले पाठकों, और जन-आंदोलनों की प्रेरणा ढूँढ़ने वालों के लिए एक अनमोल ग्रंथ है।

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