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Parul

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प्रफुल्ल एक प्राध्यापक है, पूरी तरह अकादेमिक संसार में डूबा हुआ। उसे जीवन की निस्सारता को मानने वाले शंकर के अद्वैत वेदांत के दर्शन ने गढ़ा है। दूसरी ओर पारुल है, मिट्टी की सुन्दर देन के रूप में ऐसी स्त्री जो प्रेम की सच्चाई में और उन समस्त वस्तुओं की वास्तविकता में विश्वास करती है जिन्हें जीवन ने उसे सौंपा है। एक अवसर इन दोनों को मिला देता है जो न केवल उन्हें उस प्रेम के रिश्ते में बाँधता है जो वर्ष के ग्यारह माहों की ग्यारह पूर्णिमाओं तक फैला है बल्कि वह एक संवाद भी बन जाता है, शंकर के अद्वैत दर्शन और भागवत के माधुर्य के दो दार्शनिक सिद्धांतों के बीच। जैसे ही इन दोनों के मध्य रोमांस के क्षण खुलते जाते हैं, बुद्धि और विषयासक्ति के बीच संवाद आरंभ हो जाता है जिसमें दोनों एक-दूसरे के बारे में प्रश्न खड़े करते हैं और जैसे ही चैत्र माह, माघ माह तक आता है, रूपांतरण आरंभ हो जाता है। जैसे जैसे हर्ष दहेजिया इस प्रेम कहानी को गूंथते चलते हैं जिसमें पारिजात के साथ संवाद होता है और दो प्रेमी चम्पा के वृक्ष के तले बतियाते हैं, वैसे वैसे इस युगल के द्वारा बिताए गए क्षण केवल श्रृंगारिक मात्र नहीं रहते, बल्कि जीवन के अर्थ को परखने के लिए, एक अंतर्दृष्टि बन जाते हैं। इन क्षणों में हम प्रेम में समाई उस विषयासक्ति को सुनते और अनुभव करते हैं जो बुद्धि और दर्शन के परस्पर संवाद से उपजी है। इस हृदय स्पर्शी रोमांटिक रिश्ते में अंतिम यथार्थ की तलाश उल्लास से भरपूर पवन और पखेरूओं के गान के साथ मौजूद है, दर्शन में डूबे विचार और कोमल अनुभूतियां, यादगार रंग और जानी पहचानी ध्वनियां, मदिर गंध और सुविचारित संरचना, मिथक और रूपक यहाँ एक-दूसरे से आहिस्ता आहिस्ता हो रहे दो प्रेमियों के वार्तालाप में घुले मिले हैं।

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