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जैसे मोहमाया में फँसी आत्मा बार-बार नए शरीर के माध्यम से जन्म लेती रहती है, वही हाल स्वयंसेवी संस्थान के इन संस्थापक सदस्यों का था। वे बार-बार कमेटी में वापस आते रहते थे। कभी संरक्षक बनकर तो कभी एक सदस्य का चोला धारण करके, किसी-न-किसी रूप में आते जरूर थे। अगर किसी कारणवश न आ पाते, तो किसी भटकती आत्मा की तरह यत्र-तत्र-सर्वत्र संस्था के कार्यक्रमों के माध्यम से अपने होने का अहसास कराते रहते।
वे कहीं भी यह जताने से नहीं चूकते थे कि उनके कमेटी में न होने से संस्था का कितना नुकसान हो रहा है, उनके बिना सभी कुछ अस्त-व्यस्त हो रहा है। अतः अगली बार कमेटी में उनकी पुनः वापसी बहुत ही आवश्यक है; उनके इन वचनों को सुनकर गीता के चौथे अध्याय का 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ' याद आ जाता था। जैसे आत्मा को कोई नहीं मार सकता, वैसे ही इन संस्थानों से चिपके लोगों को कोई नहीं हटा सकता था।
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