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सोशल मीडिया के दौर में जो दो भारतीय विद्वान् सर्वाधिक 'कोट' किए जाते हैं, वे हैं चाणक्य और गालिब। विडंबना यह है कि ये दोनों सर्वाधिक मिसकोट भी किए जाते हैं। जहाँ सोशल मीडिया गालिब के पैरोडी शेरों से लबालब भरा रहता है तो वहीं चाणक्य नीति के नाम पर ऐसी बातें कही जाती हैं, जो उन्होंने कभी कही ही नहीं।
सोशल मीडिया पर इनकी दिन-रात हो रही इस दुर्गति से क्षुब्ध होकर उनके दो डाई हार्ड प्रशंसक इसको ठीक करने का बीड़ा उठाते हैं। संयोगवश उसी समय शहर में हत्याएँ हो रही हैं, हत्याओं में एक रोचक पैटर्न यह है कि मृतक के हाथ में जो पर्ची मिलती है, उसमें कभी तो चाणक्य का श्लोक होता है तो कभी गालिब का शेर।
डिटेक्टिव ध्रुव त्यागी सूत्रों को जोड़ता हुआ कातिल को ढूँढ़ रहा है। वहीं गालिब-चाणक्य के दो प्रशंसक आम जनता, मीडिया और राजनीतिज्ञों से अनुरोध करते हैं, पर बदले में खुद ही उनसे अपमानित होते हैं; अंत में वे अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं। इसके लिए वे शहर में हो रही सीरियल हत्याओं का दोष भी अपने सिर ले लेते हैं। अदालत में उनके साथ क्या होता है और ध्रुव त्यागी कैसे यह केस हल करता है, वह इस उपन्यास का पटाक्षेप है।
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