{"product_id":"aapka-manto","title":"Aapka Manto","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eइस किताब में मंटो के अब तक मौजूद सारे ख़त जमा किए गए हैं। हिन्दी पढ़ने वालों के लिए मंटो साहब का नाम कोई नया नहीं। हिन्दी वालों का भी मंटो पर उतना ही हक़ है, जितना उर्दू का। इस वजह से हिन्दी का एक बड़ा पाठक वर्ग इन ख़ुतूत के ज़रिए मंटो की ज़िन्दगी के उस हिस्से से भी रूशनास होगा, जिस पर अभी बहुत ज़्यादा रौशनी नहीं पड़ी है।अब तक मंटो के मौजूद ख़ुतूत की गिनती 142 है, जो उसकी लिखी गई कहानियों की गिनती से भी बहुत कम है। मौजूद ख़ुतूत में सबसे ज़्यादा ख़त मंटो ने अहमद नदीम क़ासमी को ही लिखे। इन ख़ुतूत के ज़रिए मंटो की जो तस्वीर क़ारी के मन में उभरती है, उसे अगर एक जुमले में बयान करना हो तो हम ‘a man without mask’ कह सकते हैं। उर्दू साहित्य की दुनिया में मोहम्मद असलम परवेज़ का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। एक लम्बे समय से वो रंगकर्मी के तौर पर हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी रंगमंच से जुड़े हैं। उनके लिखे कई नाटक मुंबई के पृथ्वी और टाटा थिएटर के अलावा दूसरे शहरों में खेले जाते रहे हैं। इसके अलावा मराठी और गुजराती प्रोफ़ेशनल स्टेज पर भी उनके नाटक खेले जाते रहे हैं। मोहम्मद असलम परवेज़ की एक पहचान मंटो आलोचक की भी है। उन्होंने मंटो को नित नए ज़ावियों से समझने की कोशिश की। मंटो के हवाले से उनकी किताबें ‘आप का मंटो’, ‘मंटो और चचा सैम’, ‘मंटो : अफ़सानों के दरमियाँ’, और ‘मंटो : सियाह हाशिए और हाशिया अराइयाँ’ अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Mohit Publishers and Educational Aids","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48255146197237,"sku":"94565","price":339.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0755\/3099\/3909\/files\/9789394494565.jpg?v=1781167667","url":"https:\/\/www.mohitpublishers.com\/products\/aapka-manto","provider":"Mohit Publishers and Educational Aids","version":"1.0","type":"link"}